सुरज ने कहा यदि हम न उगें तो रत्रि कि कौन भगाए
चन्दा ये कहे यदि मै न आऊँ कवि मन को कौन उकसाये
धरती ये कहे यदि न चलूँ तो क्या सूरज क्या चन्दा
दोनों ही है व्यर्थ बस मैं हूँ समर्थ भार लेती हूँ जन जन का
पशू – पक्षी कहे छोडो उनको उनका तो है लड़ना काम
कभी चन्द्र ग्रहण कभी सूर्य ग्रहण भूकम्प करे काम तमाम
यदि हम न रहे सूरज न उगे चन्दा की तो क्या है बिसात
धरती की सारी सुन्दरता पर छायी है अपनी जमात
मानव ये कहे क्यों ये झगड़े कभी सुन लो हमारी भी बात
अस्तित्व तुम्हारी तभी तक है जब हम सुने ये फ़रियाद
पेड़-पौधे कहे मुझे नष्ट न करो मानव हम पेड़ उगाये
धरती ये कहे मुझे मत बाँटो मानव फ़िर दोस्ती बढ़ाये
पशू –पक्षी कहे हमें मत मारो मानव हम उनको बचाये
हम ही तो है सबके रक्षक क्या हो यदि भक्षक बन जाये
सच तो है धरा सूरज चन्दा पशू पक्षी और हम इन्सां
सब एक दूजे के पूरक है उनमे न हो कोइ हिंसा
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Wednesday, March 31, 2010
Saturday, March 27, 2010
मुहावरोक्ति
रवि के होते नौ दो ग्यारह रूचि के तो हो गए पौ बारह
छू मंतर हो गयी दुःख सारे हुई खत्म नकली ये प्यार का खेल
खरी खोटी सुनाया जम के रूचि गिरगिट रवि का रंग बदल गया
उसको तो किनारा करना था वह टाल-मटोल कर निकल गया
रूचि के दुनिया में बहार आयी आँखों का पर्दा सिमट गया
उसे तजने को जो ठानी थी जीना उसका भी खुश्वार हुआ
मेरी ये पंक्ति कविता नहीं ये मुहावरों का मेला है
जो कोई गलती दिख जाये ठीक करें आप का स्वागत है
छू मंतर हो गयी दुःख सारे हुई खत्म नकली ये प्यार का खेल
खरी खोटी सुनाया जम के रूचि गिरगिट रवि का रंग बदल गया
उसको तो किनारा करना था वह टाल-मटोल कर निकल गया
रूचि के दुनिया में बहार आयी आँखों का पर्दा सिमट गया
उसे तजने को जो ठानी थी जीना उसका भी खुश्वार हुआ
मेरी ये पंक्ति कविता नहीं ये मुहावरों का मेला है
जो कोई गलती दिख जाये ठीक करें आप का स्वागत है
अमृतान्जल
आसमान का रंग है नीला हरी-हरी सी धरती
मटमैला है रंग ज़मीं की पर रंग नहीं है जल की
हर रंग में यह ढल जाती है है यह बात गजब की
नष्ट न करो इस अमृत को संरक्षण कर लो जल की
पीकर घूँट अमृत की जन-जन धन्यवाद दो इश्वर को
बेकार न हो जाये जीवन पानी को सांस समझ लो
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